Monday, June 26, 2017

अंतरिक्ष में जीवन की घोषणा होने वाली है?

एक हैक्टिविस्ट ग्रुप ने दावा किया है कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा को अंतरिक्ष में जीवन के चिह्न मिल गए हैं और जल्द ही यह संस्था इस बात की घोषणा करने वाली है। इस ग्रुप ने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि हाल में नासा के एक आधिकारिक प्रवक्ता ने अमेरिका की विज्ञान, अंतरिक्ष और तकनीकी समिति की बैठक में कहा कि अंतरिक्ष में जीवन होने के प्रमाण मिल गए हैं। इस हैक्टिविस्ट ग्रुप ने अपनी वैबसाइट में कहा, "Latest anonymous message in 2017 just arrived with a huge announcement about the Intelligent Alien Life! NASA says aliens are coming!"..."Many other planets throughout the universe probably hosted intelligent life long before Earth did."

अप्रेल में एक संसदीय सुनवाई में नासा के साइंस मिशन डायरेक्टरेट के एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर प्रोफेसर टॉमस जुर्बुचेन ने कहा था कि हम अंतरिक्ष में जीवन की सम्भावनाओं के करीब पहुँच रहे हैं।  
https://www.youtube.com/watch?time_continue=4&v=HGh8n1XxDrg



Sunday, June 25, 2017

विरोधी दलों के उभरते अंतर्विरोध

बीजेपी ने रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति पद के लिए घोषित नहीं किया होता तो शायद विरोधी दल मीरा कुमार के नाम को सामने नहीं लाते। इस मुकाबले की बुनियादी वजह दलित पहचान है। यह बात राजनीति की प्रतीकात्मकता और पाखंड को व्यक्त करती है। अलबत्ता इस घटना क्रम के कारण महा-एकता कायम करने की विपक्षी राजनीति की जबर्दस्त धक्का भी लगा है। सवाल यह है कि राष्ट्रपति चुनाव के बहाने जन्मी एकता केवल राष्ट्रपति चुनाव तक सीमित रहेगी या सन 2019 के चुनाव तक जारी रहेगी? दूसरे क्या केवल साम्प्रदायिकता-विरोध के आधार पर कायम की गई वैचारिक-एकता लम्बी दूरी की राजनीति का आधार बन सकती है?
लालू प्रसाद यादव का यह कहना कि जेडीयू ने रामनाथ कोविंद का समर्थन करके ऐतिहासिक भूल की है, एक नई राजनीति का प्रस्थान बिंदु है। बिहार में इन दोनों पार्टियों के बीच जो असहजता है, वह खुले में आ गई है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का एक मंच पर आना भी एक नई राजनीति की शुरुआत है। देखना होगा कि इस एकता के पीछे कितनी संजीदगी है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि विपक्ष ने दलित प्रत्याशी को नहीं उतारा तो उनके पास रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।

Saturday, June 24, 2017

प्रणब मुखर्जी: विकट दौर के सहज राष्ट्रपति


भारतीय संविधान के अनुसार देश का राष्ट्रपति भारत सरकार का प्रशासनिक प्रमुख है, पर व्यवहार में वह अपने ज्यादातर काम सत्तारूढ़ सरकार की सलाह पर करता है। बहुत कम काम ऐसे होते हैं, जिन्हें उनका व्यक्तिगत निर्णय कहा जाए। हर साल संसद के बजट सत्र की शुरुआत में उनका भाषण एक तरह से सत्तारूढ़ दल की सरकार लिखती है। सरकारी काम-काज के बाहर की सभाओं, गोष्ठियों में कई बार राष्ट्रपति अपने निजी विचार व्यक्त करते हैं, जिन्हें बड़े गौर से सुना जाता है। ऐसी टिप्पणियों से, अध्यादेशों को पुनर्विचार के लिए सरकार के पास वापस भेजने और कैदियों की सज़ा-माफी और कुछ नियुक्तियों के फैसलों से ही राष्ट्रपतियों के व्यक्तित्व के फर्क का पता लगता है।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ राधाकृष्णन, डॉ ज़ाकिर हुसेन, ज्ञानी जैल सिंह, केआर नारायण, एपीजे अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल और प्रणब मुखर्जी तक सभी राष्ट्रपतियों की कुछ न कुछ खास बातें याद की जाती हैं, खासतौर से तब जब वे विदा होते हैं। 24 जुलाई को प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल के पाँच साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में यह समझना बेहतर होगा कि ऐसी कौन सी बातें हैं, जिनके लिए उन्हें विशेष रूप से याद किया जाए।

परिपक्व राजपुरुष

जैसा कि अंदेशा था, सन 2014 में त्रिशंकु संसद होती तब शायद प्रणब मुखर्जी की समझदारी की परीक्षा होती। उन्होंने इसके लिए पहले से विशेषज्ञों से राय भी ले रखी थी। पर ऐसा मौका आया नहीं। पर इतना जरूर है कि पिछले तीन साल में उन्होंने कोई ऐसा फैसला नहीं किया, जिससे उन्हें विवादास्पद कहा जाए। जब भी उन्हें मौका मिला उन्होंने अपनी राय गोष्ठियों और सभाओं में जाहिर कीं। यह एक परिपक्व राजपुरुष (स्टेट्समैन) का गुण है।

Tuesday, June 20, 2017

रामनाथ कोविंद का चयन बीजेपी का सोचा-समझा पलटवार है

कोविंद को लेकर यह बेकार की बहस है कि वह प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैंPramod Joshi | Published On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST | Updated On: Jun 20, 2017 09:21 AM IST

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित करने के बाद से एक निरर्थक बहस इस बात को लेकर शुरू हो गई है कि वे क्या प्रतिभा पाटिल जैसे ‘अनजाने और अप्रत्याशित’ प्रत्याशी हैं? उनकी काबिलियत क्या है और इसके पीछे की राजनीति क्या है वगैरह.

भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रत्याशी का नाम अपने दूरगामी राजनीतिक उद्देश्यों के विचार से ही तय किया है, पर इसमें गलत क्या है? राष्ट्रपति का पद अपेक्षाकृत सजावटी है और उसकी सक्रिय राजनीति में कोई भूमिका नहीं है, पर राजेंद्र प्रसाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी राजनीतिक कारणों से ही चुने गए.

इमर्जेंसी : यादों के कुछ काले-सफेद पन्ने

सुबह के अखबारों में जेपी की रैली की खबर थी, जिसमें देश की जनता से अपील की गई थी कि वह इस अवैधसरकार को खारिज कर दे। टैक्स देना बंद करो, छात्र स्कूल जाना बंद करें, सैनिक, पुलिस और सरकारी कर्मचारी अपने अफसरों के हुक्म मानने से इंकार करें। रेडियो स्टेशनों को चलने नहीं दें, क्योंकि रेडियो झूठबोलता है। लखनऊ के स्वतंत्र भारत में काम करते हुए मुझे डेढ़-दो साल हुए थे। सम्पादकीय विभाग में मैं सबसे जूनियर था। खबरों को लेकर जोश था और सामाजिक बदलाव का भूत भी सिर पर सवार था। 26 जून 1975 की सुबह किसी ने बताया कि रेडियो पर इंदिरा गांधी का राष्ट्र के नाम संदेश आया था, जिसमें उन्होंने घोषणा की है कि राष्ट्रपति जी ने देश में आपातकाल की घोषणा की है।
आपातकाल या इमर्जेंसी लगने का मतलब मुझे फौरन समझ में नहीं आया। एक दिन पहले ही अखबारों में खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को अपने पद पर बनाए रखा है, पर उनके तमाम अधिकार खत्म कर दिए हैं। वे संसद में वोट भी नहीं दे सकती हैं। इंदिरा गांधी के नेतृत्व और उसके सामने की चुनौतियाँ दिखाई पड़ती थीं, पर इसके आगे कुछ समझ में नहीं आता था।
हमारे सम्पादकीय विभाग में दो गुट बन गए थे। कुछ लोग इंदिरा गांधी के खिलाफ थे और कुछ लोग उनके पक्ष में भी थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमे की खबर की कॉपी मुझे ही अनुवाद करने के लिए मिलती थी, जिससे मुझे मुकदमे की पृष्ठभूमि समझ में आती थी। हमारे यहाँ हिन्दी की एजेंसी सिर्फ हिन्दुस्तान समाचार थी। वह भी जिलों की खबरें देती थी, जो दिन में दो या तीन बार वहाँ से आदमी टाइप की गई कॉपी देने आता था। हिन्दुस्तान समाचार का टेलीप्रिंटर नहीं था। आज के मुकाबले उस जमाने का मीडिया बेहद सुस्त था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम पर सुबह और रात की रेडियो खबरें ही थीं। टीवी लखनऊ में उसी साल नवम्बर में आया, जून में वह भी नहीं था। आने के बाद भी शाम की छोटी सी सभा होती थी। आज के नज़रिए से वह मीडिया नहीं था। केवल शाम को खेती-किसानी की बातें बताता और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री के भाषणों का विवरण देता था।