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Monday, May 22, 2017

  जीएसटी यानी एक नए युग में प्रवेश

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने की तारीख नजदीक आने के पहले उससे जुड़ी सारी प्रक्रियाएं तकरीबन पूरी हो चुकी हैं। जीएसटी कौंसिल की श्रीनगर में हुई बैठकों में वस्तुओं और सेवाओं की दरों को मंजूरी मिल चुकी है। अभी अटकलें हैं कि कौन सी चीजें या सेवाएं सस्ती होंगी और कौन सी महंगी। यह मानकर चलना चाहिए कि इस व्यवस्था के लाभ सामने आने में दो साल लगेंगे। एक बड़ा काम हो गया, फिलहाल यह बड़ा लाभ है।
मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर टीका-टिप्पणियों का दौर चल रहा है। ज्यादातर बातें राजनीतिक हैं, पर इस राजनीति के पीछे बुनियादी बातें आर्थिक हैं। जीएसटी के अलावा आर्थिक सवालों का सबसे बड़ा रिश्ता रोजगार से है। सरकार की बागडोर संभालते ही नरेन्द्र मोदी ने हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था। यह वादा पूरा होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। लेबर ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार फीसदी की आर्थिक संवृद्धि के बावजूद पिछले साल रोजगार सृजन में केवल 1.1 फीसदी का इजाफा हुआ। यानी कि जितने नए रोजगार बनने चाहिए थे, उतने नहीं बने। सवाल है कितने नए रोजगार बने? यह सवाल भटकाने वाला है। इसे लेकर रोज सिर फुटौवल होता है, पर कोई नहीं जानता कि कितने नए रोजगार बने या कितने नहीं बने।

Sunday, November 6, 2016

उम्मीद की किरण है जीएसटी

लम्बे अरसे से टलती जा रही जीएसटी व्यवस्था आखिरकार शक्ल लेने लगी है। पिछले गुरुवार को जीएसटी कौंसिल ने आम सहमति से टैक्स की चार दरों पर सहमति कायम करके एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। अब जो सबसे जटिल मसला है वह यह कि इस राजस्व के वितरण का फॉर्मूला क्या होगा। चूंकि इसे 1 अप्रैल 2017 से लागू होना है, इसलिए यह काम जल्द से जल्द निपटाना होगा। चूंकि इस साल बजट भी अपेक्षाकृत जल्दी आ रहा है, इसलिए यह उत्सुकता बनी है कि यह सब कैसे होगा।