Saturday, May 14, 2011

खुद को पुनर्परिभाषित करे वाम मोर्चा

यह लेख 13 मई के दैनिक जनवाणी में छपा था। इसके संदर्भ अब भी प्रासंगिक हैं, इसलिए इसे यहाँ लगाया है।

हार कर भी जीत सकता है वाम मोर्चा

कल्पना कीजिए कभी चीन में चुनावों के मार्फत सरकार बदलने लगे तो क्या होगा? चीन में ही नहीं उत्तरी कोरिया और क्यूबा में क्या होगा? यह कल्पना कभी सच हुई तो सत्ता परिवर्तन के बाद का नज़ारा कुछ वैसा होगा जैसा हमें पश्चिम बंगाल में देखने को मिलेगा। बशर्ते परिणाम वैसे ही हों जैसे एक्ज़िट पोल बता रहे हैं। देश का मीडिया इस बात पर एकमत लगता है कि वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सरकार विदा होगी। ऐसा नहीं हुआ तो विस्मय होगा और मीडिया की समझदारी विश्लेषण का नया विषय होगी।

Tuesday, May 10, 2011

पोस्ट घोटाला, पहले चुनाव


पाँच विधानसभाओं के चुनाव तय करेंगे राष्ट्रीय राजनीति की दिशा
तेरह को खत्म होंगे कुछ किन्तु-परन्तु
प्रमोद जोशी

राजनीति हमारी राष्ट्रीय संस्कृति और चुनाव हमारे महोत्सव हैं। इस विषय पर हाई स्कूल के छात्रों से लेख लिखवाने का वक्त अभी नहीं आया, पर आयडिया अच्छा है। गरबा डांस, भांगड़ा, कथाकली, कुचीपुडी और लाल मिर्चे के अचार जैसी है हमारी चुनाव संस्कृति। जब हम कुछ फैसला नहीं कर पाते तो जनता पर छोड़ देते हैं कि वही कुछ फैसला करे।    

टू-जी मामले में कनिमोझी की ज़मानत पर फैसला 14 मई तक के लिए मुल्तवी हो गया है। 14 के एक दिन पहले 13 को तमिलनाडु सहित पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आ चुके होंगे। कनिमोझी की ज़मानत का चुनाव परिणाम से कोई वास्ता नहीं है, पर चुनाव परिणाम का रिश्ता समूचे देश की राजनीति से है। तमिलनाडु की जनता क्या इतना जानने के बाद भी डीएमके को जिताएगी? डीएमके हार गई तो क्या यूपीए के समीकरण बदलेंगे?

कुछ ऐसे ही सवाल बंगाल के चुनाव को लेकर हैं। बंगाल में तृण मूल कांग्रेस का सितारा बुलंदी पर है। वे जीतीं तो मुख्यमंत्री भी बनेंगी। बेशक उनके बाद रेल मंत्रालय उनकी पार्टी को ही मिलेगा, पर क्या कांग्रेस बंगाल की सरकार में शामिल होगी? सन 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महत्वपूर्ण सफलता मिली थी। पर अब सन 2009 नहीं है। और न वह कांग्रेस है। पिछले एक साल में राष्ट्रीय राजनीति 360 डिग्री घूम गई है।

Saturday, May 7, 2011

इतिहास के सबसे नाज़ुक मोड़ पर पाकिस्तान



बहुत सी बातें ऐसी हैं, जिनके बारे में हमारे देश के सामान्य नागरिक से लेकर बड़े विशेषज्ञों तक की एक राय है। कोई नहीं मानता कि बिन लादेन के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद खत्म हो जाएगा। या पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की नीतियाँ बदल जाएंगी। अल-कायदा का जो भी हो, लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद, तहरीके तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे थे वैसे ही रहेंगे। दाऊद इब्राहीम, हफीज़ सईद और  मौलाना मसूद अज़हर को हम उस तरह पकड़कर नहीं ला पाएंगे जैसे बिन लादेन को अमेरिकी फौजी मारकर वापस आ गए।

बिन लादेन की मौत के बाद लाहौर में हुई नमाज़ का नेतृत्व हफीज़ सईद ने किया। मुम्बई पर हमले के सिलसिले में उनके संगठन का हाथ होने के साफ सबूतों के बावजूद पाकिस्तानी अदालतों ने उनपर कोई कार्रवाई नहीं होने दी। अमेरिका और भारत की ताकत और असर में फर्क है। इसे लेकर दुखी होने की ज़रूरत भी नहीं है। फिर भी लादेन प्रकरण के बाद दक्षिण एशिया के राजनैतिक-सामाजिक हालात में कुछ न कुछ बदलाव होगा। उसे देखने-समझने की ज़रूरत है। 

Thursday, May 5, 2011

राजनीति का रखवाला कौन?


समय-संदर्भ
 पीएसी या जेपीसी बहुत फर्क नहीं पड़ता ज़नाब
अब राजनीति माने काजू-कतरी

ब्रिटिश कॉमन सभा में सन 1857 में पहली बार यह माँग उठी थी कि सरकारी खर्च सही तरीके से हुए हैं या नहीं, इसपर निगाह रखने के लिए एक समिति होनी चाहिए। सन 1861 में वहाँ पहली पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की स्थापना की गई। हमने इसे ब्रिटिश व्यवस्था से ग्रहण किया है। ब्रिटिश व्यवस्था में भी पीएसी अध्यक्ष पद परम्परा से मुख्य विपक्षी दल के पास होता है। इन दिनों वहाँ लेबर पार्टी की मारग्रेट हॉज पीएसी की अध्यक्ष हैं। पीएसी क्या होती है और क्यों वह महत्वपूर्ण है, यह बात पिछले साल तब चर्चा में आई जब टू-जी मामले की जाँच का मसला उठा।

पीएसी या जेपीसी, जाँच जहाँ भी होगी वहाँ राजनैतिक सवाल उठेंगे। मुरली मनोहर जोशी द्वारा तैयार की गई रपट सर्वानुमति से नही है, यह बात हाल के घटनाक्रम से पता लग चुकी है। पर क्या समिति के भीतर सर्वानुमति बनाने की कोशिश हुई थी या नहीं यह स्पष्ट नहीं है। बेहतर यही था कि रपट के एक-एक पैरा पर विचार होता। पर क्या समिति में शामिल कांग्रेस और डीएमके सदस्य उन पैराग्राफ्स पर सहमत हो सकते थे, जो प्रधानमंत्री के अलावा तत्कालीन वित्त और संचार मंत्रियों के खिलाफ थे। और क्या पार्टी का अनुशासन ऐसी समितियों के सदस्यों पर लागू नहीं होता? साथ ही क्या मुरली मनोहर जोशी राजनीति को किनारे करके ऑब्जेक्टिव रपट लिख सकते थे? बहरहाल जोशी जी के फिर से पीएसी अध्यक्ष बन जाने के बाद एक नया राजनैतिक विवाद खड़ा होने के पहले ही समाप्त हो गया। यह हमारी व्यवस्था की प्रौढ़ता की निशानी भी है।