Sunday, July 23, 2017

बे-काम दुनिया में जीवन का अर्थ




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Monday, July 17, 2017

राष्ट्रपति चुनाव के बाद मोदी के हाथ मजबूत होंगे

प्रमोद जोशी
वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
17 जुलाई 2017
देश की राजनीति के लिहाज़ से सोमवार को दो बड़ी घटनाएं होंगी. पहला दिल्ली में सोलहवीं संसद का चौथा मॉनसून सत्र शुरू होगा, और दूसरा दिल्ली और देश के सभी राज्यों की राजधानियों में देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे. 

ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि इस चुनाव का औपचारिकता से ज़्यादा कोई मतलब भी है या नहीं? लगता है कि बीजेपी गठबंधन के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद यह चुनाव जीत जाएंगे. 

सवाल है कि नए राष्ट्रपति के आगमन से बीजेपी गठबंधन सरकार की स्थिति में क्या बदलाव आएगा? क्या मोदी सरकार की स्थिति बेहतर हो जाएगी?

प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे. उनके कार्यकाल में भी मोदी सरकार को कभी परेशानी नहीं हुई. 

हाल में नरेंद्र मोदी ने उन्हें कृतज्ञता में पिता-तुल्य माना और कहा, 'मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मुझे प्रणब दा की उँगली पकड़ कर दिल्ली की ज़िंदगी में ख़ुद को स्थापित करने का मौका मिला.'

राष्ट्रपति का चुनाव हालांकि राजनीतिक गतिविधि है, पर उसके नाटकीय निहितार्थ नहीं होते. ज़्यादा से ज़्यादा सत्तारूढ़ दल के रसूख का पता लगता है. आमतौर पर उसके नतीजों का पहले से अनुमान होता है.

इस पद की संवैधानिक भूमिका भी काफी हद तक औपचारिक है. कहते हैं कि वह केवल 'रबर स्टांप' है. पर बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह भूमिका कुछ ख़ास मौकों पर महत्वपूर्ण भी हो सकती है.

नए दौर में प्रवेश करती भारतीय राजनीति

राजनीतिक गलियारों में डेढ़-दो महीने की अपेक्षाकृत चुप्पी के बाद आज दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं होने जा रहीं हैं, जिनका राजनीति पर असर देखने को मिलेगा. देश के चौदहवें राष्ट्रपति के चुनाव के अलावा संसद का मॉनसून सत्र आज शुरू हो रहा है. सोलहवीं लोकसभा के तीन साल गुजर जाने के बाद यह पहला मौका है, जब 18 विरोधी दल एक सामूहिक रणनीति के साथ संसद में उतर रहे हैं. पिछले मंगलवार को इन दलों ने उप-राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम तय करने के साथ अपनी भावी रणनीति का खाका भी तय किया है. ये दल अब महीने में कम से कम एक बार बैठक करेंगे. ये बैठकें दिल्ली में ही नहीं अलग-अलग राज्यों में होंगी. ज्यादा महत्वपूर्ण है संसदीय गतिविधियों में इनका समन्वय. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अब क्रमशः तेज होगी.

Sunday, July 16, 2017

काजल की कोठरी क्यों बनी राजनीति?

एक सामान्य कारोबारी को लखपति से करोड़पति बनने में दस साल लगते हैं, पर आप राजनीति में हों तो यह चमत्कार इससे भी कम समय में संभव है। वह भी बगैर किसी कारोबार में हाथ लगाए। बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी का दावा है कि लालू प्रसाद का परिवार 2000 करोड़ रुपये की संपत्ति का मालिक है। इस दावे को अतिरंजित मान लें, पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी मिल्कियत करोड़ों में है। कई शहरों में उनके परिवार के नाम लिखी अचल संपत्ति के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है। 

Saturday, July 15, 2017

राजनीति नहीं चाहती सीबीआई को स्वतंत्र बनाना

इस साल मई में लालू यादव के पारिवारिक ठिकानों पर जब सीबीआई की छापा-मारी हुई तो लालू यादव ने ट्वीट किया,बीजेपी में हिम्मत नहीं कि लालू की आवाज को दबा सकेलालू की आवाज दबाएंगे तो देशभर में करोड़ों लालू खड़े हो जाएंगे। यह राजनीतिक बयान था। उन छापों के बाद यह भी समझ में आने लगा कि लालू और नीतीश कुमार के बीच खलिश काफी बढ़ चुकी है। छापों की खबर आते ही लालू ने अपने ट्वीट में एक ऐसी बात लिखी जिसका इशारा नीतीश कुमार की तरफ़ था। उन्होंने लिखा, बीजेपी को उसका नया एलायंस पार्टनर मुबारक हो। बात का बतंगड़ बनने के पहले ही लालू ने बात बदल दी। उन्होंने कहा बीजेपी के पार्टनर माने आयकर विभाग और सीबीआई।

लालू ने एक तीर से दो शिकार कर लिए। वे जो कहना चाहते थे, वह हो गया। उधर नीतीश कुमार ने कहा, बीजेपी जो आरोप लगा रही है, उसमें सच्चाई है तो केंद्र सरकार अपनी एजेंसियों से जांच या कार्रवाई क्यों नहीं कराती? पिछले साल नवंबर में नोटबंदी का नीतीश कुमार ने स्वागत किया था। उसके साथ उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री को बेनामी संपत्ति के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करनी चाहिए। लालू यादव के परिवार की जिस सम्पत्ति को सीबीआई ने छापे डाले हैं, उसका मामला नीतीश की पार्टी ने ही सन 2008 में उठाया था। तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। आज बीजेपी सरकार है और बेनामी सम्पत्ति कानून में बदलाव हो चुका है। लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती और उनके पति इन दिनों सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के घेरे में हैं।